अहिंसा के पुजारी
क्रोध कपट और लोभ को छोड़
सत्य अहिंसा ले अपना
भला तू कर औरों का
मन अपना सुखमय बना
नदि, वृक्ष, धरती क्या
अपने लिए ही जीती है
ताल क्या अपने पानी को
स्वयं सारा पीती है